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मणि पर्वत


विवाह में राजा जनक ने दहेज के रूप में बहुत बड़ा खजाना तथा रत्न व मणियाँ कन्यादान में दी थीं। लोकविश्वास के अनुसार विवाहोपरांत उन मणियों का यहां पर्वत के समान ढेर लग गया था । इसीलिए आज भी इसे मणि पर्वत कहते हैं । यहाँ श्री सीताराम जी सावन में झूला झूलने आते थे। आज भी हरियाली तीज को अयोध्या के संत-महंत श्री सीता-रामजी को झूला झुलाते हैं। अयोध्या का यह महत्वपूर्ण पर्व है ।

महत्वः

यहाँ दर्शन और पूजन से कन्या विवाह की रुकावटें दूर होती हैं।

संदर्भः

ददौ कन्याशतं तासां दासीदासमनुत्तमम्,॥
हिरण्यस्य सुवर्णस्य मुक्तानां विद्रुमस्य च॥
वाल्मीकिरामायण 1/74/5

जसि रघुवीर ब्याह विधि बरनी । सकल कुअँर ब्याहे तेहिँ करनी॥
कहि न जाइ कछु दाइज भूरी । रहा कनक मनि मंडपुपूरी॥
रामचरितमानस 1/325/1

अक्षांश - 28.783444
रेखांश - 82.200058
रचना एवं निर्माण - विश्व हिंदू परिषद एवं अशोक सिंहल फाउण्डेशन
शोधकर्ता - डॉ रामावतार श्रीराम सांस्कृतिक शोध संस्थान न्यास
सौजन्य से - भागचन्दका परिवाार, वसंत विहार, नई दिल्ली


मणि पर्वत

महत्वः

यहाँ दर्शन और पूजन से कन्या विवाह की रुका वटें दूर होती हैं।

संदर्भः

ददौ कन्याशतं तासां दासीदासमनुत्तमम्,॥
हिरण्यस्य सुवर्णस्य मुक्तानां विद्रुमस्य च॥
वाल्मीकिरामायण 1/74/5

जसि रघुवीर ब्याह विधि बरनी । सकल कुअँर ब्याहे तेहिँ करनी॥
कहि न जाइ कछु दाइज भूरी । रहा कनक मनि मंडपुपूरी॥
रामचरितमानस 1/325/1

अक्षांश - 28.783444
रेखांश - 82.200058
रचना एवं निर्माण - अशोक सिंहल फाउण्डेशन एवं M2K फाउण्डेशन
शोधकर्ता - डॉ रामावतार श्रीराम सांस्कृतिक शोध संस्थान न्यास
सौजन्य से - भागचन्दका परिवाार, वसंत विहार, नई दिल्ली
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